आधा चाँद

“क्या आपको इस से मोहब्बत हो गई है ?” , उसकी दीदी ने मुझसे पूछा ।

“अम्मम पता नहीं मगर मोहब्बत से पहले का एक दौर होता है जो कि मोहब्बत से भी ख़ूबसूरत होता, हम शायद उस दौर के आस पास हैं”, मैंने जवाब दिया ।

“ये कौनसा और कैसा दौर होता है ज़रा बताएँ?”, उन्होंने पूछा ।

“ये वो दौर होता है जब आप एक दूसरे से मिलने या देखने के लिए बेचैन होते हो, आपके बीच बहुत सारी बातें नहीं होती मगर एक बहुत गहरा राबता होता है, आप बेवजह ख़ुश रहते हो, आप उसकी कोई बात याद करके अकेले ही मुस्कुरा रहे होते हो और आपके घरवाले आपको शक की निगाह से देखते हुए आपको पागल समझने लगते हैं और आपको किसी की कोई परवाह नहीं रहती किसी का कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, आप एक अधूरे ख़्वाब में जी रहे होते हैं और अधूरापन ज़िंदगी की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती है, मुझे कभी भी कोई भी मुकम्मल चीज़ अच्छी नहीं लगती, एक मुकम्मल तस्वीर आप सिर्फ़ एक बार देख कर हट जाओगे, एक अधूरी तस्वीर आपको अपने अन्दर खींचती रहती है, मुझे हमेशा वो लोग पसंद आते हैं जिनमे कोई ख़ामी है, कोई एब है, कुछ कमी है, कोई दाग़ है, जो अधूरे है, जो कम हैं, जो ज़िन्दा हैं, मुकम्मल का मतलब मर जाना होता है।” मैं एक साँस में ये सब बोल गया मुझे पता भी नहीं चला ।

“मुकम्मल का मतलब मर जाना होता है, ये आपको कैसे पता ?” निशा , उसकी दीदी, ने पूछा ।

“मैं वहाँ तक जा चुका हुँ”,

“फिर उसके बाद?”

“उसके बाद मुझे ख़ुद को मारना पड़ा, बड़ी मशक़्क़त से बुरी तरह से ख़ुद को बिखेरा, तब कहीं जाकर मैं फिर से ज़िन्दा हो पाया ।”

“और अगर कोई मुकम्मल ही इस तरह हो जैसे किसी कलाकार की तराशी हुई मूर्त हो जिसे देखकर हर कोई आह भरे की वाह निकले ?” उन्होंने एक उम्मीद भरा जवाब दिया जो असल में सवाल था ।

“सबसे बड़ी त्रासदी है किसी कलाकार की एक मुकम्मल रचना बनके रह जाना, फिर आप किसी किताब के पन्नों में दबे , या किसी दीवार की कील से लटके या किसी शीशे की अलमारी में जड़े या किसी कोने में पड़े रहते हो, कुछ लोग आपको पढ़ लेते है कुछ देख लेते हैं निहार लेते है और उनमें से कुछ एक को अगर आप अच्छे लग गए तो वो आपको ख़रीदकर अपने घर की अलमारी दीवार और कोने में लाकर रख देंगे वहाँ उनके मेहमान आपको देखेंगे आपकी तारीफ़ करेंगे मगर ख़रीद नहीं पाएँगे फिर आप शायद पूरी उम्र उसी एक कमरे में पड़े गुज़ार देंगे और आपकी चीख़ें किसी को सुनाई तक नहीं देंगी।” मुझे ज़ोर की प्यास लगी थी तो बोतल उठाकर एक घूँट में आधी ख़ाली कर दी, मेरी प्यास भी बुझ गयी और वो आधी ख़ाली बोतल मुझे और अच्छी लगने लगी ।

मेरा जवाब सुनकर कई देर तक उनकी पलक भी नहीं झपकी , वो एकटक एक ही तरफ़ देखती रहीं, मैं उनकी आँखों में उनके मुकम्मल होने का दर्द साफ़ साफ़ देख पा रहा था , संध्या ने , उसका नाम संध्या है, मेरा हाथ अपने हाथ में लिया मुझे ऐसा लगा मैं फिर से जी उठा हुँ, तभी निशा ने दूर क्षितिज की ओर देखते हुए मुझसे पूछा , “आपका नाम क्या है ?”

“मेरा नाम चाँद है ।”