मनाली मालरोड की भीड़ से बचने की कोशिश में मैं ऊपर ओल्ड मनाली की तरफ़ पैदल चलने लगा, पहाड़ों में पहुँचते ही मुझे जैसे कुछ हो जाता है मन में अजीब हलचल होने लगती है और उस वक़्त मैं सिर्फ़ पैदल चलना चाहता हुँ, तो मैं साईकिल से उतर कर पैदल चलने लगा, पतली सी सड़क थी मगर इतनी सारी गाड़ियाँ, कभी कभी मुझे लगता है कि मालरोड से ओल्ड मनाली एक किलोमीटर से थोड़ा सा ज़्यादा है और लोग घण्टों गाड़ी में सफ़र करके यहाँ आते हैं उन्हें तो ख़ुद मनाली पहुँचते ही गाड़ी से उतरने की बेचैनी होनी चाहिए ताकि अब वो पहाड़ों की ख़ूबसूरती को निहारें और खुली हवा में टहलते हुए इस जगह का आनन्द उठाएँ, मगर ये हर जगह गाड़ी में बैठकर जा रहे है । ख़ैर किसी का कोई क्या कर सकता है , सो मैं धीरे धीरे चलता रहा, बहुत दिनों से dosa खाने की क्रेविंग हो रही थी और मुझे एक साउथ इंडियन ढाबा दिख गया, मैं ख़ुश हुआ और साईकिल दीवार के साथ लगा कर अंदर चला गया। dosa खाकर जो तृप्ति मिली वो ऐसी थी जैसे ज़िंदगी में जो आप बहुत समय से पाना चाह रहे थे और वो आपको मिल गया हो ।

Dosa खाकर मैं ओल्ड मनाली एक दुकान के बाहर साईकिल रखकर, टहलता टहलता ऊपर निकल गया जहाँ से एक पगडंडी ऊपर पहाड़ी की तरफ़ जा रही थी और मैं उस पर चलने लगा, थोड़ी दूर जाते ही एक लड़की ने आवाज़ लगाई “Hey do you know where this trail goes?” , मैंने कहा “वही पता करने जा रहा हुँ”, वो जंगल वाले साइड से पगडंडी पर कूदी और साथ चलते हुए बोली , “मनाली पहली बार आए हो?” मैंने कहा नहीं पहले भी आ चुका हुँ, उसपर वो बोली, “Lemme guess, तुम कोई ऐसे deep आर्टिस्ट टाइप आदमी हो जो करोना और लाक्डाउन की मार के बाद कुछ inspiration की तलाश में यहाँ पहाड़ों में आ गया और किसी टुरिस्ट हॉस्टल में volunteer कर रहा है और हफ़्ते में एक दो दिन ऐसे पहाड़ी पर घूमने निकल जाता है” , मेरा ज़ोर से हँसने का मन था मगर एक हल्की मुस्कान के बाद मैंने बताया कि, “मैं करोना से पहले का चला हुआ हुँ और करोना ख़त्म हो जाएगा मैं उसके बाद भी चलता रहूँगा”…

तो उसने भी एक गहरे मज़ाक़िया अन्दाज़ में पूछा, “और ये पहले से कहाँ से चला हुँ और बाद में भी कहाँ तक चलता रहूँगा ?”, इस बात पर हम दोनों की हँसी छूट गयी, मैंने कहा “मैं दो साल से साईकिल पर पूरा भारत ट्रैवल कर रहा हुँ”, उसका थोड़े आश्चर्य में जवाब आया, “Tell me you’re joking, no man, you’re crazy or what”, मैंने कहा “you’re right, I’m crazy”, “लगते तो नहीं हो वैसे” उसने ग़ौर से देखकर कहा, “लगते नहीं हो क्या मतलब, अब सिर पर सींग लगा के घूमूँ”, और फिर एक हँसी छूटी ।

“मैं स्कूबा डाईवर बन कर समन्दर के अंदर और नीचे जो वाइल्डलाइफ़ है उसकी फ़ोटोग्राफ़र बनना चाहती थी, मगर बंगलोर में इंजिनीरिंग पढ़ कर अब यहाँ पहाड़ों में पता नहीं क्या कर रही हुँ”, उसने बड़ी सहजता से कहा । “तो वो deep आर्टिस्ट टाइप इंसान तुम हो जो तुम मुझमें ढूँढने की कोशिश कर रही थी?” मैंने कहा और फिर उसकी तरफ़ देखा, एक बार उसके चेहरे पर भाव आया जैसे वो कुछ छुपा रही हो और मैंने उसकी चोरी पकड़ ली हो, मगर वो काफ़ी chill थी, उसने कहा, “उम्म्म्म्म्म्म हाँ शायद, मगर तुम तो एक ख़्वाब टाइप आदमी निकले यार, जो एक ख़्वाब देखे और उसको जीना शुरू करदे…”

“ख़्वाब ही तो हैं जो हमें ज़िन्दा रखे हुए हैं, वरना ज़िंदगी में से ख़्वाबों को निकाल दो तो बचता क्या है ? हमारे पास जीते रहने का कोई बहना या मक़सद नहीं है ख़्वाब के बिना, हम बहुत थोड़े से समय में इस दुनिया, यहाँ के हालात और लोगों से बोर हो जाएँगे, क्या है हमारे पास ख़्वाबों के अलावा ।”, मैं इतना कहकर रुक गया ये सोचकर कि शायद उसे ये ना लगे कि मैं बहुत गहराई वाली बातें करने लगा हुँ । उसने एक बार मेरी तरफ़ देखा और हम दोनों चुप पगडंडी पर चलने लगे, “किसी के ख़्वाब पूरे ना हों तो वो क्या करता है”, उसने पूछा और फिर से हम चुपचाप चलने लगे, मैं समझ गया था ये बात उसके दिल के ठीक उतनी ही गहराई से आयी है जितनी गहराई में वो स्कूबा डाईवर बनकर समन्दर में उतरना चाहती थी… कुछ दूर चलकर मुझे एल्बर्ट कामु याद आ गए और मैं एकदम बोल गया, “वो सिसिफ़स बन जाते हैं”, अब ये नहीं है कि उसे समन्दर में जाने का शौक़ था और इंजिनीरिंग की थी तो उसे साहित्य की समझ नहीं थी, सिसिफ़स नाम सुनते ही वो समझ गयी थी, सो उसने कहा, “अब भी तो हम पहाड़ ही चढ़ रहे हैं”, मैंने कहा “हाँ, मगर ये हम अपनी मर्ज़ी से चढ़ रहे हैं और हमें हर रोज़ बस इसी एक पहाड़ पर नहीं चढ़ना है, इस पहाड़ पर चढ़कर जो दूसरे पहाड़ वहाँ से दिखाई देंगे तो हम उन पहाड़ों पर चढ़ने का ख़्वाब देखेंगे, अगर हम ख़्वाबों के पीछे उन पहाड़ों पर चले गए तो हम हम होंगे और अगर रोज़ इसी पहाड़ पर चढ़ते उतरते रहे तो हम सिसिफ़स।”

इसके बाद थोड़ी देर तक हम ख़ामोशी से पहाड़ी पर चढ़ते रहे, ये असहाय ख़ामोशी नहीं थी, ये एक आपसी समझ और शांति वाली ख़ामोशी थी ।

उसने ख़ामोशी तोड़ते हुए पूछा,

“तुमने कभी समन्दर देखा है?”

“हाँ एक बार, और जब पहली बार समन्दर किनारे पहुँचा था फिर महीनों समन्दर का पीछा नहीं छोड़ा, वो अलग बात है रहा मैं किनारे-किनारे पर ही” मैंने कहा ।

“क्यूँ ? इतना ज़्यादा पसंद आया समन्दर तुम्हें ? और पहाड़ों की तरह वहाँ पार जाने के ख़्वाब नहीं आए ?”, उसने मेरी तरफ़ देखते हुए एक ही बार में समन्दर के सारे सवाल दाग़ दिए, जैसे समन्दर ने पहाड़ों में उसे मुझसे अपने सवालों के जवाब लेने के लिए भेजा हो ।

उसके सवाल सुनकर मुझे कच्छ में माँडवी का बीच याद आ गया जहाँ मैंने ज़िंदगी में सबसे पहले समन्दर देखा था, मैं इस क़दर ख़ुश और रोमांचित था जैसे मैंने कोई बड़ी जंग जीत ली हो, जैसे जैसे शाम के बाद लोग अपने घरों को चले गए और रात में सिर्फ़ मैं और समन्दर रह गए थे तब रोमांच ग़ायब हो गया था और एक गहरी शांति का एहसास होने लगा था, एक अनन्त अथाह विस्तृत स्पेस मेरे सामने था, बहुत दूर किसी समुद्री जहाज़ या मछुआरे की नाव पर कोई लाइट चमकती हुई दिखती जो मेरी उत्सुकता को जगा देती और थोड़ी देर मैं इस सोच में डूब जाता कि ये इतनी रात को समन्दर में घूम रहे हैं क्या कमाल है, काश समन्दर में साईकिल चल सकती, मैं यहाँ से सीधा बम्बई जाता ।

मैं इन सब ख़यालों में खोया हुआ चल रहा था तभी एक पत्थर की ठोकर से वापिस पहाड़ों में होश आया और उसने चुटकी लेते ही कहा, “क्या हुआ, समन्दर की गहराई में इतना डूब गए की अपने पहाड़ भूल गए?”

मैंने कहा, “नहीं…हाँ… शायद, दरअसल ऐसा है कि पहाड़ के ऊपर चढ़कर हम गहराई में खोते हैं और समन्दर हमें किनारे बैठे बैठे अपनी गहराई में डुबो लेता है, तो वहाँ किनारे पर बैठे बैठे ही मैं रात के दो बजे तक समन्दर के अंदर की दुनिया के ख़यालों में डूबा रहा, और फिर समन्दर की गहराई में जाने के लिए ख़्वाबों के साथ साथ तैरना भी आना चाहिए।” मेरे इतना कहते ही हम दोनों हँसने लगे ।

“I can’t believe तुम्हें तैरना नहीं आता”, उसने हैरानी से कहा।

“तैरना आता है मुझे, स्कूबा डाईविंग वाला तैरना नहीं आता।” मैंने स्पष्ट किया ।

“कोई ना मैं सिखा दूँगी जब अगली बार समन्दर की तरफ़ आओगे ।” उसने एक अन्दाज़ में ये बात कही ।

“और तुम कौनसे समंदर के किस किनारे पर मिलोगी?” मैंने जवाब में पूछा ।

“वो तुम मुम्बई से समन्दर का किनारा पकड़ कर नीचे की तरफ़ आते रहना, कहीं किसी किनारे पर टकर ही जाएँगे ।” उसने भी झट से जवाब दिया जैसे वो भविष्य का नक़्शा बना कर बैठी हो ।

“फिर तो मेरा ख़याल कहता है कि जब मैं तुम्हारे किनारे से गुजरूँगा उस वक़्त तुम समन्दर की गहराइयों में स्कूबा डाईविंग कर रही होगी और मैं गुज़र जाऊँगा “ मैंने कहा ।

“ये तो मैंने सोचा ही नहीं था”, इतना कहकर हम दोनों फिर चुपचाप चलने लगे ।

इस बार शायद हम दोनों इस ख़याल में डूबे थे कि कितनी अजीब बात है हम एक दूसरे के साथ साथ एक पहाड़ पर चढ़ रहे हैं इस वक़्त जहाँ हमारी मौजूदगी है, हम एक दूसरे को देख सुन छू सकते हैं और हम दूर भविष्य में कहीं दूर किसी समन्दर के किनारे मिलने के वादे कर रहे हैं, हम इन्सानों की यही दिक्कत है हम जब जहाँ जिस हाल में जिसके साथ होते हैं उस पल को हम किसी और पल की कल्पना में बर्बाद कर देते हैं ।

हमें पता भी नहीं चला कि हम पहाड़ी पर पहुँच चुके थे और दूर उस पार के ऊँचे पहाड़ों में समन्दर का वो किनारा तलाश रहे थे जहाँ से हम समन्दर की गहराई में उतरेंगे ।

“क्या मैं तुम्हें चूम सकता हूँ ?” मैंने उसके चेहरे को देखते हुए पूछा ।

“वो किस ख़ुशी में?”, उसने तीखी नज़र से मुझे देखतेहुए पूछा ।

“वो होता है ना जब कोई नन्हा बच्चा कई देर से किसी खेल में लगा हो और ऊबकर बैठा हो, उसे सामने कुछ दिख जाए, और फिर वो सारा खेल भूलकर अपने हाथों और घुटनों के बल अपने आप में ही ख़ुश किलकारियाँ मारता हुआ अनायास ही उस ओर चलने लगता है …”,

मेरी बात पूरी होने से पहले ही उसने अपनी बाँहें मेरे गले में डालकर मेरी ज़बान बंद कर दी, बच्चा चुप होकर नए खेल में मशगूल हो गया, जब तक हम समन्दर की गहराई से तैरकर वापस किनारे पर पहुँचे सूरज दूर वाले पहाड़ के पीछे डूब चुका था, अगली सुबह सूरज निकलने के साथ ही वो दरिया की तरह पहाड़ों से अपने समन्दर की तलाश में निकल पड़ी, और मैं ख़्वाबों के पीछे दूर क्षितिज के पार वाले पहाड़ की तरफ़ निकल पड़ा…।