खीरगंगा की लोकप्रियता और महत्व

खीरगंगा हिमाचल में सबसे लोकप्रिय ट्रेकिंग स्थलों में से एक है। यह कसोल के पास पार्वती घाटी में लगभग 3000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। 10 किलोमीटर का ट्रेक, कसोल से 22 किलोमीटर दूर एक छोटे से गांव बरशैणी से शुरू होता है। खीरगंगा तक पहुंचने में एक मध्यम ट्रेकर को लगभग चार घंटे लगते हैं। यह स्थान युवाओं के बीच बहुत लोकप्रिय है और हर साल देश और दुनिया से हज़ारों लोग इस ट्रेक के लिए पार्वती घाटी जाते हैं। खीरगंगा शिव की भूमि है। इसे एक पवित्र स्थान भी माना जाता है क्योंकि स्थानीय किंवदंतियों का मानना है कि भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय ने कई साल यहां बिताए और खीरगंगा की एक गुफा में ध्यान लगाया था। यहाँ एक छोटा सा मंदिर है जो कि बहुत प्राचीन है। खीरगंगा दो शब्दों का एक संयोजन है खीर जिसका अर्थ है दूध और चावल से बना एक मीठा पकवान, और गंगा नदी या धारा।इसे ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि वहाँ एक प्राकृतिक गर्म पानी का झरना है और पानी में बहुत पतले चावल जैसे कण होते हैं। तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे खीर की धारा बह रही हो। ऐसा माना जाता है कि उस पानी में स्नान करना पवित्र होता है और इसके स्वास्थ्य सम्बंधित लाभ भी हैं जैसे कि यह त्वचा और पेट की समस्याओं को ठीक कर सकता है।

खीरगंगा का मेरा अनुभव

मुझे अप्रेल 2019 में खीरगंगा जाने का मौक़ा मिला। एक दिन शाम को आठ बजे चंडीगढ़ से भुंतर की बस पकड़ी जहाँ मैं सुबह चार बजे पहुँचा। वातावरण में हल्की सर्दी थी तो बस में ही जेकेट पहन ली थी और भुंतर भी एक घंटा अगली बस का इंतज़ार करना था । वहाँ से पाँच बजे के बाद बरशैनि की बस चली जिसमें मैं कसोल तक का टिकट लेकर बैठ गया । लगभग सात बजे बस कसोल पहुँची जहाँ उतरकर मैंने राहत की साँस ली । मेरी समस्या ये है के बस कार या कोई भी बंद गाड़ी में मेरा दम घुटता है मुझे हमेशा उलटी आती है इसलिए उतरते ही सबसे पहले मैं पार्वती नदी के किनारे जाकर बैठा थोड़ी देर के लिए खुली हवा में साँस लेने के बाद मन कुछ ठीक हुआ तो एक छोटा रेस्टोरेंट खुला था वहाँ नाश्ता किया और चौक पर अगली बस का इंतज़ार करने लगा । थोड़ी देर में बस आई जिसने मुझे 10 बजे बरशैणी पहुँचा दिया । बरशैणी में ज़्यादा वक़्त ना गँवाते हुए मैंने खाना खाया, एक दुकान वाले से बीस रुपए में ट्रेक के लिए एक लाठी ली और चल पड़ा।

बरशैणी से खीरगंगा के लिए दो रास्ते जाते हैं, दोनों बरशैणी के पास पुल से शुरू होते हैं और आगे जाकर जंगल में मिलते हैं। ज़्यादातर लोग जिन्हें ये पता होता है वो एक रास्ते से जाते है और दूसरे रास्ते से वापस आते है। इस तरह से आपको दोनों रास्तों को ट्रेक करने का मौक़ा मिल जाता है। मुझे उस वक़्त पता नहीं था के ट्रेक का रास्ता किधर से जाता है तो मैंने किसी से पूछा और पुल पार करके एक संकरी पगडंडी ऊपर जंगल की तरफ़ जाती है उसपे चल पड़ा । थोड़ा आगे चल कर कुछ और लोग दिखे तो यक़ीन हो गया के मैं सही रास्ते पर जा रहा था । खीरगंगा के ट्रेक जंगल से होकर गुजरते हैं और रास्ते में कुछ अद्भुत झरने देखने को मिलते हैं। उन में कुछ झरनों का पानी बहुत साफ़ ठंडा और दूध सा सफ़ेद रंग झलकता होता है। पार्वती नदी से पानी के गिरने और बहने की आवाज़ पूरे रास्ते में एक सुखदायक संगीत पैदा करती है। जंगल में शांत वातावरण कुछ ऐसा है जो आपके दिल और आत्मा को सुकून प्रदान करता है।

जाते समय शुरुआत में ही एक छोटा सा गाँव आया था उसके बाद आगे सिर्फ़ जंगल ही जंगल है। पुरे रास्ते आवाज़ के नाम पे सिर्फ़ बहते हुए पानी की आवाज़ सुनाई देती है, या फिर कहीं कहीं पक्षियों की चहचहाट, बीच बीच में कुछ ट्रेक पर जाते या आते लोग अपने साथ एक ब्लूटूथ स्पीकर में मन को भाने वाले गाने सुनते हुए भी मिल जाते है। इतनी सुंदर जगह में गाने सुनकर मन और भी रोमांचित महसूस करता है। सब आने जाने वाले लोगों के चेहरे पर जुनून और सुकून साफ़ झलकता है ऐसा है खीरगंगा के ट्रेक का जादू ।

रास्ते में कहीं कहीं छोटी चाय नाश्ते की स्टाल भी थी तो लगभग दो घंटे चलने के बाद मैंने थोड़ा आराम करने का सोचा और जंगल में विशालकाय पेड़ों से घिरी हुई एक जगह पर एक स्टाल दिखी तो वहाँ थोड़ी देर रुका । थोड़ा सुस्ताने और चाय पीने के बाद मैंने चलना जारी रखा । बीच रास्ते में जहाँ दोनो ट्रेक मिलते है वहाँ एक झरने के पास दो छोटे केफे है । आराम करने के लिए अच्छी जगह है वहाँ हर समय कुछ यात्री खाते पीते आराम करते मिलते है।

कृपया ट्रेक के रास्ते में कचरा न फेंके और हमारे प्यारे और ख़ूबसूरत पहाड़ों को साफ़ सुथरा रखने में सहयोग करें। 🏔

लगभग साढ़े तीन बजे मैं खीरगंगा पहुँचा । पार्वती घाटी की गोद में एक ख़ूबसूरत गर्म पानी का कुण्ड और उसके पास फैले हुए कुछ केफे और तम्बू जहाँ यात्रियों को खाना और रुकने को मिलता है। मैंने उस गरम पानी के चश्मे के बारे में सुना हुआ था तो केफे वालों से पुछ कर मैं ऊपर सीधा कुंड के पास पहुँचा। मौसम ठण्डा था मगर मैं थका हुआ भी था तो ताज़ा गरम पानी का भरा पूल देख कर अपने कपड़े उतारे और उतर गया अंदर कुण्ड के। उस गरमा गरम पानी में डुबकी लगाते ही मेरी सारी थकान दूर हो गयी । शरीर को बहुत आराम मिला और इतना अच्छा लग रहा था के मैं आधे घंटे पानी में पड़ा रहा।

तभी बारिश का मौसम बना तो मैं निकलकर एकदम तरोताज़ा महसूस कर रहा था और एक केफे में जाकर नीचे ज़मीन पर बैठने के छोटे गद्दे थे वहाँ बैठकर चाय पी इतने में बारिश शुरू हो गयी और मौसम और ठण्डा हो गया । थोड़ी देर में बरसात रुकने के बाद और भी ख़ूबसूरत हो गया था वातावरण । पहाड़ों पर जंगल से धुँध के बादल उठ रहे थे सर्दी बढ़ रही थी सभी केफ़ेस में कुछ ना कुछ गर्मा गरम और स्वादिष्ट चीज़ों के पकने की ख़ुश्बू आ रही थी । लोग इत्मिनान से बाहर खुले में बैठे चाय और मैग्गी का आनंद ले रहे थे, कुछ लोग तस्वीरें खींच रहे थे और कुछ और लोग पहुँच रहे थे । शाम वाक़ई में बहुत सुहावनी हो गयी थी ।

रात ढलते ही अलग अलग जगह पर लोग आग जलाकर उसके चारों और बैठकर सर्द रात में पहाड़ों में कुछ पल सुकून के बिताने में व्यस्त थे। हर जगह अपने अपने पसंदीदा संगीत चल रहे थे और प्रतीत हो रहा था मानों सारी दुनिया से दूर उस पहाड़ पर एक अलग संसार बसा हुआ था जहाँ सब लोग ख़ुश थे माहौल में रौनक़ और सुकून थे जैसे जैसे रात बढ़ती गयी सब लोग एक एक करके अपने अपने तम्बुओं में जा कर सो गए और अंत में बस रात के अंधेरे और ख़ामोशी में बीच बीच में दूर पहाड़ी पर जंगल में से किसी जानवर के कूकने की आवाज़ आ जाती और फिर सब सन्नाटा।

अगली सुबह मैं उठा फिरसे एक घंटा कुंड में बिताया फिर नाश्ता किया और वहाँ से नीचे आने के लिए प्रस्थान किया। आते समय मैं दूसरे रास्ते से आया जिसपर एक दो बेहद रोमांचक झरने देखने को मिले। ख़ुशी ख़ुशी मैं दो तीन घंटे में बरशैणी पहुँचा वहाँ से कसोल की बस ली और कुछ देर वहाँ घुमने के बाद एक होम सटे में कमरा लिया और सो गया। अगले दिन वहाँ से फिर तीर्थन घाटी में जिभी चला गया।